बनवासी समाज की परंपरा, बेबसी और सपनों की कहानी

इस डिजिटल और प्लास्टिक-प्रधान युग में, जब सब कुछ मशीनों और बाजार की दौड़ में समाहित हो चुका है, ऐसे समय में उत्तर प्रदेश के वाराणसी जनपद की सड़क किनारे झांकती एक तस्वीर दिल को छू जाती है। ये तस्वीर है – महुआ के पत्तों को तोड़ते, गिनते और गड्डी बनाते केदार बनवासी और उनका परिवार।जी हां, मिर्जापुर या सोनभद्र जैसे पहाड़ी जनपदों की बात नहीं हो रही, और ना ही छत्तीसगढ़ या झारखंड की जनजातीय पट्टी की। यह कहानी वाराणसी के एक गांव खुटहना की है, जहां चौबेपुर थाना क्षेत्र में रहने वाले 40 वर्षीय केदार बनवासी अपने परिवार के साथ आज भी पीढ़ियों से चले आ रहे परंपरागत कार्य – महुआ पत्ता संग्रहण और विक्रय – से अपनी आजीविका चला रहे हैं।
पेड़ों से पत्तों तक- जीवन का सफर
वाराणसी-आजमगढ़ हाईवे पर चोलापुर बाईपास के पास गोला में केदार, पत्नी राधिका और छोटे बेटे भारत के साथ पेड़ों से पत्ते तोड़ते मिल जाते हैं। महुआ के पत्तों को सावधानी से चुनकर, 100-100 की गड्डियों में बांधा जाता है। ये गड्डियां वाराणसी के बाजार ‘गोलगड्डा’ में 10 से 15 रुपए तक बिकती हैं। एक दिन की कड़ी मेहनत से लगभग 400-500 रुपए तक की आमदनी हो जाती है। महुआ के पत्तों की बात करें तो, गूगल और वन विभाग के मुताबिक, महुआ (Madhuca longifolia) का पेड़ आदिवासी क्षेत्रों में ‘जीवनदायक वृक्ष’ माना जाता है। इसके पत्ते जहां दोना-पत्तल बनाने में उपयोग होते हैं, वहीं इसके फूल और बीज औषधीय और खाद्य उपयोगों में भी काम आते हैं। भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, महुआ वन क्षेत्रों में लाखों लोगों की आजीविका का आधार है – विशेष रूप से अनुसूचित जनजातियों के लिए।
एक परिवार, पांच भाई और कुछ अधूरे सपने
केदार के चार भाई – ननकू, कल्लू, राजू और मक्कू – भी कभी इस काम में लगे थे, पर अब कोई दिहाड़ी पर है, कोई पलायन कर गया। उनके पिता राजनाथ और मां मुन्नी देवी अब वृद्ध हो चुके हैं, जिन्होंने कभी यही काम किया, पर अब उनकी आंखों में बस शून्यता है – उम्र की थकान और समय की मार। केदार का बड़ा बेटा राकेश कोलकाता के एक ईंट भट्ठे पर मजदूरी कर रहा है, जबकि छोटा बेटा भारत, जो कक्षा 5 का छात्र है, स्कूल से लौटने के बाद पत्ते तोड़ने में हाथ बंटाता है। बेटी शशिकला की शादी हो चुकी है।
बेबसी के बीच उगते कुछ सपने
केदार खुलकर नहीं कहते कि उन्हें क्या चाहिए। शायद इसलिए कि उम्मीदें कई बार बोझ बन जाती हैं। लेकिन जब बात बच्चों की आती है तो उनकी आंखों में एक हल्की सी चमक आ जाती है। वे कहते हैं,
> “हम चाहत हईं कि हमार लइका-लइकी पढ़-लिख के कुछ बन जाएं। जे काम हम कर रहे हैं, उ उनके नसीब में ना हो।” वे मानते हैं कि सरकारी नौकरी तो एक सपना है, लेकिन अगर किस्मत साथ दे गई, तो वह दिन भी आएगा जब उनके बच्चे किताबों से दोस्ती करेंगे, न कि पत्तों से।
कहां है नीति और व्यवस्था
सरकारी योजनाएं जनजातीय कल्याण के नाम पर कागजों में दिखती हैं। लेकिन केदार जैसे परिवार उन सूचियों में शायद नाम तक दर्ज नहीं करवा पाए हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, रोजगार – इन सभी मोर्चों पर उन्हें आज भी संघर्ष करना पड़ता है। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या लगभग 10.43 करोड़ है, जिसमें अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं और आजीविका के लिए पारंपरिक कार्यों पर निर्भर हैं। सरकार द्वारा घोषित वन उपजों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) योजना का लाभ भी ऐसे लोग शायद ही कभी उठा पाते हैं।
परंपरा की पीड़ा और उम्मीद की लौ
महुआ के पत्तों से जीवन चलाना कोई असाधारण कार्य नहीं, लेकिन आज के संदर्भ में यह एक जीवित परंपरा है – जो संघर्ष, आत्मसम्मान और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक है।केदार बनवासी की कहानी सिर्फ महुआ के पत्तों की नहीं, बल्कि उस पूरे जनजातीय समाज की कहानी है, जो आज भी विकास की परिभाषा से दूर, प्रकृति की गोद में जीवन तलाश रहा है – नमी में भीगी उम्मीदों के साथ।
क्या हम सुन रहे हैं
यह सवाल हम सबके लिए है- नीति-निर्माताओं के लिए, समाज के लिए और उन पढ़े-लिखे लोगों के लिए भी जो अक्सर इन चेहरों को सिर्फ “ग्रामीण भारत” कहकर भूल जाते हैं।
रिपोर्ट- राजेश कुमार वर्मा




