साबो : लड़कियों की शिक्षा और सशक्तिकरण के लिए सावित्री देवी डालमिया की संघर्ष की अनकही कहानी

सुशील कुमार मिश्र/ वाराणसी
वाराणसी के हृदय में, ‘साबो हेरिटेज होम’ न केवल एक बुटीक होटल के रूप में बल्कि सावित्री देवी डालमिया की जीवित विरासत के रूप में बनाया जा रहा है – सावित्री देवी डालमिया ब्रिटिश काल में लड़कियों की शिक्षा और उनके सशक्तिकरण की एक शांत और प्रबल समर्थक रहीं और एक दूरदर्शी सोच रखते हुए उन्होंने ने बेटियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कई सार्थक प्रयास किये। सावित्री देवी डालमिया – जिन्हें प्यार से साबो के नाम से जाना गया – एक ऐसे प्रभावशाली व्यक्तित्व वाली महिला थीं जिन्होंने औपनिवेशिक भारत में एक ऐसे शांत आंदोलन की नींव रखी जिसने बेटियों को शिक्षा के माध्यम से समाज में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। सावित्री देवी डालमिया यानि साबो उन गुमनाम नायकों में से थीं, जिन्होंने ब्रिटिश राज और पितृसत्ता की छाया में भी लड़कियों की शिक्षा और बेटियों के सपने देखने के अधिकार की वकालत की।
आध्यात्मिक नगर वाराणसी के हृदय में बसने जा रहा साबो नामक एक बुटीक लक्ज़री हेरिटेज होम सावित्री देवी डालमिया यानि साबो की जीवंत कहानी बताएगा। कभी आलीशान निवास स्थान रहा यह घर अब उस स्नेहमयी और दृढ़ महिला को श्रद्धांजलि होगा, जिसने उस समय समानता में विश्वास करने का साहस किया, जब महिलाओं से अपेक्षा की जाती थी कि वे परदे में रहें और अव्यक्त रहें। उनके बेटे कुणाल डालमिया द्वारा बड़े मनोयोग से तैयार किया जा रहा ‘साबो’ एक होटल से कहीं बढ़कर होगा – यह साहस, करुणा और शांत विद्रोह में निहित शक्ति और संस्कार की विरासत का पुनर्जीवन होगा। 20वीं सदी की शुरुआत में वाराणसी के कचौरी गली की जीवंत गलियों में जन्मी सावित्री देवी डालमिया ने छोटी उम्र से ही रूढ़िगत सामाजिक मानदंडों को चुनौती दी। उनके पिता – एक दूरदर्शी व्यक्ति – ने सुनिश्चित किया कि वह अंग्रेजी माध्यम के मिशनरी स्कूल में पढ़ाई करें। वहाँ, उन्होंने किताबों की शक्ति, ज्ञान की ताकत और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की महत्ता समझी।
इन दोनों की स्थापना में साबो जी की भूमिका महत्वपूर्ण रही। सावित्री देवी डालमिया विज्ञान भवन प्रतिवर्ष हजारों छात्राओं को उच्च शिक्षा के मार्ग पर प्रशस्त करता है और डालमिया हॉस्टल में सैकड़ों छात्रों के सपने साकार होते हैं। शांत स्वभाव से महान कार्य कर जाने की सावित्री देवी डालमिया जी के व्यक्तित्व की छाप आज भी बी. एच. यू. परिसर में महसूस की जा सकती है। जब उनके बेटे कुणाल डालमिया को वाराणसी में पारिवारिक घर विरासत में मिला – जिसे मूल रूप से 1960 के दशक के अंत में लक्ष्मी निवास डालमिया ने खरीदा था – तो उन्होंने सिर्फ़ एक जीर्णोद्धार परियोजना से कहीं ज़्यादा की कल्पना की।
उन्होंने उस महान महिला को सम्मानित करने का अवसर देखा जिसने अपनी विनम्रता, आंतरिक शक्ति और दूरदर्शिता के ज़रिए उन्हें और अनगिनत अन्य लोगों को आकार दिया। घर, जो कभी राजा गोस्वामी परिवार का था, को एक बुटीक हेरिटेज प्रॉपर्टी में बदला जा रहा है – और अपनी माँ की याद में इसका नाम कुणाल जी ने साबो रखा है। साबो के सबसे बड़े ऐतिहासिक महत्वों में से एक ये भी रहा है कि 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी के दौरान, डालमिया भवन उन उल्लेखनीय हस्तियों के लिए एक आश्रय स्थल के रूप में कार्य करता था, जिनके योगदान ने भारतीय इतिहास की दिशा को आकार दिया था। इसके पवित्र हॉल ने एनी बेसेंट, महात्मा गांधी, सरोजिनी नायडू और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे लोगों का स्वागत किया है। सम्मानित मेहमानों की ऐसी परंपरा इस वास्तुशिल्प रत्न के वैभव और भी बढ़ा देती है।




