BHU पूर्व डीन,समकालीन कलाकार प्रो उत्तमा दीक्षित 2 नवम्बर को बर्लिन में शोध – प्रदर्शनी,द फॉरेस्ट सीरीज करेंगी प्रस्तुत

सुशील कुमार मिश्र
हिंदुस्तान संदेश /वाराणसी। जहां यूरोप की सांस्कृतिक व बौद्धिक राजधानी कहे जाने वाले बर्लिन के इस मुख्य राजनयिक परिसर में स्थान पाना कूटनीतिक चयन के एक बेहद जटिल व त्रि-स्तरीय कड़े मापदंडों को पार करने जैसा है जिसमें भारत सरकार के विदेश मंत्रालय, अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संबंध परिषद और वैश्विक राजनयिकों की उच्च-स्तरीय चयन समितियों द्वारा कलाकार के पूरे जीवन की तीन-चार दशकों की साधना, कलाकृतियों की बौद्धिक गहराई और देश की राष्ट्रीय ब्रांड छवि के प्रोटोकॉल का सूक्ष्म मूल्यांकन किया जाता है और यही वजह है कि यहाँ आम कलाकारों या सामान्य प्रस्तुतियों का चयन होना पूरी तरह असंभव होता है तथा पूर्व में प्रदर्शन कलाओं जैसे संगीत व नृत्य के क्षेत्र में बनारस घराने के कुछ दिग्गजों को ही यहाँ प्रस्तुति का अवसर मिला है l परंतु दृश्य कला के इतिहास में यह रिकॉर्ड पहली बार प्रो उत्तमा दीक्षित को उनकी तीस वर्ष की अनवरत कला साधना, काशी की लोक चित्रकला पर आधारित उनकी प्रतिष्ठित पुस्तक और उनके बार्सिलोना स्पेन, फ्लोरेंस इटली, इंडोनेशिया के मैगलंग इंस्टीट्यूट, नेपाल तथा वियना ऑस्ट्रिया के समृद्ध अंतरराष्ट्रीय एक्सपोज़र के कारण मिला है। पिछले दो-तीन वर्षों से एक समर्पित पर्यावरण कलाकार के रूप में काम कर रहीं प्रो दीक्षित ने आधुनिकीकरण के नाम पर वनों की अंधाधुंध कटाई के खिलाफ कला को जागरूकता का माध्यम बनाया है ताकि हमारी हरी-भरी सुंदर दुनिया केवल पेंटिंग के एक फ्रेम के भीतर सिमट कर न रह जाए और उनकी यह एकल प्रदर्शनी मध्य भारत के घने जंगलों की जैव विविधता और प्राचीन आदिवासी लोक कलाओं के प्रतीकों की वैज्ञानिक प्रासंगिकता पर आधारित है जहां वे कला, पर्यावरण और पारिस्थितिक स्थिरता के अंतर्संबंधों पर वैज्ञानिक व्याख्यान देने के तुरंत बाद सभागार में उपस्थित सैकड़ों राजनयिकों के सामने मुख्य मंच पर बैठकर सजीव प्रदर्शन करेंगी जहाँ उपस्थित जनसमूह कैनवास पर उनकी ब्रश से निकलने वाले एक-एक स्ट्रोक और रंगों के अद्भुत सम्मिश्रण को साक्षात देखेगा जो पूरी दुनिया में भारतीय कला की बौद्धिक क्षमता का लोहा मनवाएगा। एक समर्पित प्रोफेसर होने के नाते अपने देश के प्रति पूर्ण निष्ठा के बल पर इस अंतरराष्ट्रीय मुकाम को हासिल करना उनका कर्तव्य था ताकि वे भावी पीढ़ी के लिए एक जीवंत उदाहरण बन सकें और उनका यह अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहुंचना बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के दृश्य कला के छात्रों व युवा शोधकर्ताओं के लिए संभावनाओं का एक नया आकाश खोलेगा जिससे भविष्य में विद्यार्थियों के लिए अंतरराष्ट्रीय छात्रवृत्ति, अकादमिक विनिमय कार्यक्रम और वैश्विक कला नेटवर्किंग के नए रास्ते खुलेंगे। जिसके विशिष्ट आयोजन में प्रवेश पूर्णतः निःशुल्क होने पर भी दूतावास की सुरक्षा व्यवस्था के कारण अग्रिम पंजीकरण अनिवार्य है जिसके लिए मीडिया डेस्क और कला प्रेमी मोबाइल पर सीधे आधिकारिक दूतावास पोर्टल लिंक iccr.gov.in अथवा आधिकारिक सीट पंजीकरण हब लिंक eventbrite.com का उपयोग कर तथ्यों की प्रामाणिकता की जाँच कर सकते हैं ।


