रीलबाजों के जमघट में दम तोड़ती पत्रकारिता!

जब कैमरा,लाइक और वायरल होने की होड़ में गुम होने लगे सच के सवाल
✍️विवेकानंद राय
पत्रकारिता कभी समाज का आईना हुआ करती थी, लेकिन आज डिजिटल दौर में इसके सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी हो गई है। हाथ में मोबाइल, गले में माइक और कैमरे के सामने बोलने की कला ने अनेक लोगों को रातोंरात पत्रकार होने का भ्रम दे दिया है। सोशल मीडिया पर रील बनाना, किसी घटना का वीडियो वायरल करना और खुद को पत्रकार बताकर लोगों के बीच पहचान बनाना अब आसान हो गया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या कैमरा पकड़ लेने भर से कोई पत्रकार बन जाता है? क्या माइक पर सवाल पूछ लेने से पत्रकारिता का धर्म पूरा हो जाता है? पत्रकारिता केवल तस्वीर दिखाने का नाम नहीं, बल्कि तस्वीर के पीछे छिपे सच को सामने लाने की जिम्मेदारी है। दुर्भाग्य से आज कई जगह गंभीर पत्रकारिता पर दिखावे, प्रचार और वायरल होने की भूख भारी पड़ती दिखाई दे रही है।
सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी का व्यापक संदेश
सर्वोच्च न्यायालय से जुड़ी जिस टिप्पणी का उल्लेख किया जा रहा है कि यदि हर व्यक्ति पत्रकार बनने लगे, तो दूसरों के लिए बड़ी समस्या पैदा हो सकती है, उसका मूल संदेश पत्रकारिता की जिम्मेदारी और उसके दुरुपयोग के प्रश्न से जुड़ता है। हालांकि इस टिप्पणी के सटीक शब्दों, तारीख और मामले की पुष्टि के बिना इसे न्यायालय का शब्दशः कथन मानना उचित नहीं होगा। फिर भी यह विचार आज के मीडिया परिदृश्य में गंभीर विमर्श की मांग करता है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन किसी भी अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। पत्रकारिता के नाम पर किसी की निजी जिंदगी में अनावश्यक हस्तक्षेप करना, बिना पुष्टि आरोप लगाना, अधिकारियों या आम नागरिकों पर दबाव बनाने की कोशिश करना और अधूरी जानकारी को सनसनीखेज बनाकर प्रसारित करना किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ मनमानी नहीं, बल्कि सच और जवाबदेही के प्रति प्रतिबद्धता है।
भीड़ में असली पत्रकार की पहचान
आज सोशल मीडिया के दौर में कुछ लोगों के लिए खबर का महत्व इस बात से तय होने लगा है कि उससे कितने व्यूज मिलेंगे, कितने लाइक आएंगे और कितनी तेजी से वीडियो वायरल होगा। किसी दुर्घटना में घायल व्यक्ति की मदद करने के बजाय कैमरा चालू रखना, पीड़ित परिवार के दर्द को संवेदनशीलता के बजाय तमाशे की तरह दिखाना और बिना तथ्यों की जांच किए किसी को कटघरे में खड़ा कर देना पत्रकारिता के मूल्यों पर सवाल खड़े करता है। हालांकि यह भी सच है कि सोशल मीडिया ने अनेक ईमानदार नागरिक पत्रकारों को अपनी बात रखने और स्थानीय समस्याओं को सामने लाने का अवसर दिया है। इसलिए हर डिजिटल क्रिएटर या स्वतंत्र पत्रकार को एक ही तराजू में तौलना भी उचित नहीं होगा। असली अंतर माध्यम का नहीं, बल्कि नीयत, प्रशिक्षण, तथ्य-जांच और कार्यशैली का है। रील बनाने वाला व्यक्ति जरूरी नहीं कि गलत हो और पारंपरिक मीडिया से जुड़ा हर व्यक्ति स्वतः सही नहीं हो जाता; पत्रकार की असली पहचान उसकी विश्वसनीयता और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता से होती है।
पत्रकारिता का संकट और समाज पर उसका प्रभाव
जब पत्रकारिता की जगह व्यक्तिगत स्वार्थ, दबाव बनाने की प्रवृत्ति और अपुष्ट खबरें लेने लगती हैं, तो सबसे अधिक नुकसान आम जनता का होता है। गांव की टूटी सड़क, अस्पताल में डॉक्टरों की कमी, किसानों की परेशानी, भ्रष्टाचार की शिकायत, गरीब की फरियाद और प्रशासनिक लापरवाही जैसे वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। इसके स्थान पर व्यक्तिगत विवादों, आरोप- प्रत्यारोप और सनसनीखेज वीडियो को अधिक महत्व मिलने लगता है। नतीजा यह होता है कि जनता का भरोसा मीडिया से कमजोर पड़ने लगता है और ईमानदारी से काम करने वाले पत्रकारों को भी संदेह की नजर से देखा जाने लगता है। एक वास्तविक पत्रकार को खबर प्रकाशित करने से पहले तथ्यों की पुष्टि करनी चाहिए, संबंधित पक्ष का पक्ष जानना चाहिए और गलती होने पर उसे स्वीकार करने का साहस रखना चाहिए। पत्रकारिता किसी अधिकारी की चापलूसी करने या किसी व्यक्ति को भयभीत करने का साधन नहीं, बल्कि सत्ता और व्यवस्था से सवाल पूछने तथा समाज की आवाज बनने का माध्यम है।
पत्रकारिता को बचाना है तो जिम्मेदारी को पहचानना होगा
आज जरूरत इस बात की नहीं है कि पत्रकारिता के दरवाजे किसी के लिए बंद कर दिए जाएं, बल्कि जरूरत इस बात की है कि पत्रकारिता के नाम पर होने वाले दिखावे और वास्तविक जनसेवा के बीच अंतर स्पष्ट किया जाए। पत्रकारिता में प्रवेश के लिए केवल बड़ी डिग्री या किसी संस्थान से जुड़ाव ही पर्याप्त कसौटी नहीं हो सकता; सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता, संवेदनशीलता, कानून की समझ और जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी हैं। मीडिया संस्थानों को अपने प्रतिनिधियों की पहचान और विश्वसनीयता पर ध्यान देना चाहिए, प्रशासन को पत्रकारिता के नाम पर अनुचित दबाव बनाने वालों और वास्तविक पत्रकारों के बीच अंतर करना चाहिए तथा समाज को भी हर वायरल वीडियो को सच मानने से बचना चाहिए। लोकतंत्र में स्वतंत्र पत्रकारिता एक मजबूत स्तंभ है, लेकिन उसकी मजबूती शोर से नहीं, सत्य से आती है। याद रखिए—माइक की आवाज ऊंची होने से कोई पत्रकार बड़ा नहीं होता, कैमरे की चमक से खबर विश्वसनीय नहीं बनती और वायरल होने से झूठ सच नहीं हो जाता। पत्रकारिता तब जीवित रहती है,जब पत्रकार अपने निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर जनता के हित में सच लिखता है। यदि रीलों की भीड़ में जनहित की आवाज दब गई, तो नुकसान केवल पत्रकारिता का नहीं, पूरे समाज और लोकतंत्र का होगा।
( लेखक – स्वतंत्र पत्रकार )



