पत्रकारिता के नाम पर नया कारोबार,पत्रकार के विश्वसनीयता पर सवाल

विवेकानंद राय
आज पत्रकारिता का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। तकनीक ने खबरों को आम आदमी की पहुंच तक पहुंचाने का अभूतपूर्व अवसर दिया है, लेकिन इसी के साथ पत्रकारिता के नाम पर एक नया कारोबार भी तेजी से पैर पसार रहा है। कुकुरमुत्ते की तरह तरह-तरह के नामों से तथाकथित न्यूज़ चैनल, समाचार पोर्टल और समाचार पत्र सामने आ रहे हैं। यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं कि कुछ हजार रुपये देकर कोई भी व्यक्ति पत्रकार बन सकता है। रजिस्ट्रेशन, आईडी कार्ड, नियुक्ति और सदस्यता के नाम पर धन वसूली की शिकायतें भी सामने आती रहती हैं। सवाल यह है कि क्या पत्रकारिता अब मिशन और जिम्मेदारी न रहकर केवल पहचान-पत्र बेचने का माध्यम बनती जा रही है?
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इन चमकदार दावों के पीछे अक्सर बेरोजगार और पत्रकारिता में भविष्य तलाश रहे युवाओं को निशाना बनाया जाता है। उन्हें पत्रकार बनाने, बड़ा पद देने, राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने और चैनल से जोड़ने के नाम पर शुल्क लिया जाता है। लेकिन इसके बाद उन्हें न उचित प्रशिक्षण मिलता है, न पत्रकारिता की बुनियादी समझ, न समाचार लेखन, न तथ्य-जांच और न ही पत्रकारिता की आचार-संहिता की जानकारी। परिणाम यह होता है कि आर्थिक रूप से कमजोर युवा उम्मीद लेकर इस व्यवस्था में प्रवेश करता है और धीरे-धीरे आर्थिक तथा मानसिक शोषण का शिकार हो जाता है। पत्रकारिता का सपना दिखाकर युवाओं के साथ ऐसा व्यवहार न केवल उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ है, बल्कि पूरे मीडिया जगत की प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाता है।
आज स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि बाजार में ऐसे लोग भी स्वयं को पत्रकार कह रहे हैं, जिन्हें समाचार की विश्वसनीयता, स्रोतों की पुष्टि, भाषा की शुद्धता, कानून, प्रेस की मर्यादा और पत्रकारिता की जिम्मेदारियों का पर्याप्त ज्ञान तक नहीं है। यह कहना उचित नहीं होगा कि पत्रकार बनने के लिए केवल पत्रकारिता की डिग्री ही अनिवार्य है—क्योंकि पत्रकारिता में अनुभव और प्रतिभा का भी अपना महत्व है—लेकिन प्रशिक्षण, अध्ययन, तथ्यपरकता और पेशेवर आचरण के बिना पत्रकारिता की पहचान अधूरी अवश्य है। जब पत्रकारिता की जगह केवल आईडी कार्ड, माइक और सोशल मीडिया प्रोफाइल ले लेते हैं, तब खबर और प्रचार के बीच की सीमा मिटने लगती है। इसका सीधा नुकसान उस पाठक और दर्शक को होता है, जो पत्रकार से सच और निष्पक्ष सूचना की उम्मीद करता है।
अब समय आ गया है कि मीडिया जगत स्वयं जागे और आत्ममंथन करे। पत्रकारिता को बचाने की जिम्मेदारी केवल सरकार या किसी संस्था की नहीं, बल्कि वास्तविक और जिम्मेदार पत्रकारों की भी है। मीडिया संस्थानों को पारदर्शिता, प्रशिक्षण, तथ्य-जांच और आचार-संहिता को प्राथमिकता देनी होगी। युवाओं को भी यह समझना होगा कि केवल किसी चैनल का आईडी कार्ड मिल जाना पत्रकार होने का प्रमाण नहीं है। पत्रकारिता कोई शॉर्टकट से हासिल होने वाली नौकरी नहीं, बल्कि समाज के प्रति जवाबदेही का दायित्व है। यदि पत्रकारिता के नाम पर चल रहे कथित कारोबार और आर्थिक शोषण पर समय रहते गंभीरता से विचार नहीं किया गया, तो आने वाले समय में सबसे बड़ा संकट खबरों का नहीं, खबर पर जनता के विश्वास का होगा। और जिस दिन जनता का विश्वास मीडिया से उठ गया, उस दिन लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण प्रहरी कमजोर पड़ जाएगा।


