क्या है! पितृपक्ष में पंचबलि का विशेष महत्व, जानिए क्यों कौए को पितरों का दूत कहां जाता

त्रिलोकी नाथ राय
पितृपक्ष में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट करने के लिए श्राद्ध एवं तर्पण की परंपरा निभाई जाती है। इस दौरान कौए को भोजन कराने का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कौए को पितरों का दूत माना जाता है और उसे भोजन कराने से पितरों की तृप्ति होने तथा उनका आशीर्वाद परिवार पर बने रहने की मान्यता है। पितृपक्ष में पंचबलि की परंपरा भी प्रचलित है। इसमें कौए, कुत्ते, गाय, देवताओं और चींटियों के लिए भोजन का अंश निकाला जाता है। श्राद्ध के भोजन से इन सभी को अन्न अर्पित करना जीव-जंतुओं के प्रति करुणा, सेवा और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि यदि श्राद्ध का भोजन कौआ ग्रहण कर ले तो इसे पितरों द्वारा भोजन स्वीकार किए जाने का शुभ संकेत माना जाता है। पौराणिक परंपराओं में कौए का संबंध यमराज से भी बताया गया है। इसी वजह से पितृपक्ष में कौए को भोजन कराने की परंपरा आज भी श्रद्धापूर्वक निभाई जाती है। भारतीय लोकविश्वास में कौए के आगमन को लेकर भी अनेक मान्यताएं हैं। घर के आंगन में कौए का आना या बोलना कई स्थानों पर अतिथि के आगमन का संकेत माना जाता है। हालांकि, ऐसी मान्यताएं धार्मिक आस्था और लोकपरंपराओं पर आधारित हैं। पितृपक्ष केवल पूर्वजों के स्मरण और तर्पण का पर्व ही नहीं, बल्कि जीव-जंतुओं के प्रति दया, सेवा और संवेदनशीलता का संदेश भी देता है। इस अवसर पर जरूरतमंदों को भोजन कराना तथा असहाय लोगों की सहायता करना भी पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का सार्थक माध्यम माना जाता है।



