शिक्षा व्यवस्था पर सवाल ? सरकारी स्कूलों में वीडियो बनाने पर रोक…

विवेकानंद राय
सवाल सिर्फ स्कूलों में वीडियो बनाने का नहीं, बल्कि उस पारदर्शिता का है जिससे व्यवस्था की असली तस्वीर सामने आती है। उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूलों के वीडियो और सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर दिए गए निर्देशों के बाद राजनीति गरमा गई है। सरकार इस फैसले को स्कूलों की गरिमा, बच्चों की सुरक्षा और भ्रामक सूचनाओं पर रोक लगाने से जोड़ रही है। तर्क अपनी जगह है, लेकिन सवाल यह है कि अगर सरकारी स्कूलों की व्यवस्था वास्तव में बेहतर हुई है, शिक्षक समय पर पहुंच रहे हैं, बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है और सरकारी दावे जमीन पर सच साबित हो रहे हैं, तो फिर तस्वीर और वीडियो सामने आने से परेशानी क्यों होनी चाहिए?
लोकतंत्र में व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत उसकी पारदर्शिता होती है। सरकारी स्कूल जनता के पैसे से चलते हैं। वहां पढ़ने वाले बच्चे किसी निजी संस्थान के ग्राहक नहीं, बल्कि इस देश और प्रदेश के भविष्य हैं। ऐसे में स्कूलों की स्थिति, शिक्षण व्यवस्था, मिड-डे मील, शौचालय, पेयजल, शिक्षकों की उपस्थिति और बच्चों की वास्तविक स्थिति पर सवाल उठाना कोई अपराध नहीं होना चाहिए।
बेशक, बच्चों की निजता और सुरक्षा सर्वोपरि है। बिना अनुमति बच्चों के चेहरे दिखाना, उनकी व्यक्तिगत जानकारी सार्वजनिक करना या किसी वीडियो के जरिए भ्रामक प्रचार करना गलत है। ऐसे मामलों पर नियम और कार्रवाई होनी ही चाहिए। लेकिन बच्चों की सुरक्षा के नाम पर हर वीडियो और हर तस्वीर को संदेह की नजर से देखना भी उचित नहीं कहा जा सकता। असल चिंता वहां पैदा होती है जहां कैमरा व्यवस्था की कमियों को उजागर कर देता है। एक शिक्षक स्कूल में नहीं है—वीडियो सामने आ गया।
स्कूल में साफ-सफाई की स्थिति खराब है—तस्वीर वायरल हो गई। बच्चों को अपेक्षित सुविधाएं नहीं मिल रही हैं—किसी अभिभावक ने वीडियो बना दिया। अधिकारी के निरीक्षण में सब कुछ ठीक दिखाया गया, लेकिन जमीन पर तस्वीर कुछ और निकली—सोशल मीडिया ने दोनों तस्वीरों का अंतर जनता के सामने रख दिया।
यही वह बिंदु है जहां सरकार और प्रशासन को प्रतिबंध के बजाय सुधार की संस्कृति विकसित करनी चाहिए। किसी वीडियो को गलत साबित करने का सबसे प्रभावी तरीका वीडियो बनाने वाले को रोकना नहीं, बल्कि व्यवस्था को इतना मजबूत करना है कि कोई भी वीडियो सरकार के खिलाफ सवाल खड़ा न कर सके।
यदि किसी सरकारी स्कूल में शानदार पढ़ाई हो रही है, बच्चे बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, शिक्षक ईमानदारी से जिम्मेदारी निभा रहे हैं और सुविधाएं उपलब्ध हैं, तो ऐसे वीडियो सरकार की आलोचना नहीं बल्कि सरकार के काम का प्रचार बनेंगे।
फिर सवाल यह भी है कि सोशल मीडिया के दौर में सूचना को पूरी तरह रोक पाना संभव है क्या? आज अभिभावक के हाथ में मोबाइल है, शिक्षक के हाथ में मोबाइल है और विद्यार्थी भी डिजिटल दुनिया का हिस्सा हैं। किसी घटना को दबाने की कोशिश कई बार उस घटना को और बड़ा बना देती है। सरकार को यह अंतर स्पष्ट करना होगा कि भ्रामक और तथ्यहीन सामग्री पर कार्रवाई अलग बात है और वास्तविक स्थिति दिखाने वाली सामग्री पर रोक अलग बात। उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2027 का विधानसभा चुनाव दूर नहीं है। सरकार अपने विकास कार्यों और उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाना चाहती है, वहीं विपक्ष हर कमी को राजनीतिक मुद्दा बनाने के लिए तैयार बैठा है। ऐसे माहौल में सरकार को आलोचना से घबराने के बजाय अपने काम को जनता के सामने खुलकर रखने की जरूरत है। सरकार यदि मानती है कि सरकारी स्कूलों में बड़ा बदलाव आया है, तो उसे कैमरे से डरने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। खुले स्कूल, खुली व्यवस्था और खुली निगरानी—यही सुशासन की पहचान होनी चाहिए। हां, नियम जरूरी हैं। बच्चों की सुरक्षा जरूरी है। शिक्षकों और कर्मचारियों की निजता भी जरूरी है। लेकिन नियमों का उद्देश्य सच को रोकना नहीं, गलत इस्तेमाल को रोकना होना चाहिए।क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछने वाला कैमरा दुश्मन नहीं होता। कई बार वही कैमरा उस हकीकत को सामने लाता है, जिसे सरकारी फाइलें नहीं दिखा पातीं। सरकार को वीडियो से नहीं, उस व्यवस्था से डरना चाहिए जो वीडियो में दिखाई देने लायक नहीं है। और अगर व्यवस्था मजबूत है, तो कैमरा सरकार का सबसे बड़ा गवाह बन सकता है।


