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गाजीपुर

सावन की फुहार में गूंज उठी कजरी,पिया मेंहदी लिया द मोतीझील से… गोपाल राय

सावन की रिमझिम फुहार के साथ ही पूर्वांचल की लोकसंस्कृति में कजरी गीतों की मिठास घुलने लगी है। गांवों में पेड़ों की डालियों पर झूले पड़ने लगे हैं और घर-आंगन से लेकर चौपालों तक कजरी की मधुर तान सुनाई देने लगी है। ‘हे रामा कृष्ण बने मनिहारी, पहिन के साड़ी ऐ हरि… पिया मेंहदी लिया द मोतीझील से, जाग के साइकिल से ना…’ जैसे पारंपरिक बोल सावन के उल्लास को और बढ़ा देते हैं। बारिश की बूंदों और मिट्टी की सोंधी महक के बीच जब महिलाएं सुर में सुर मिलाकर कजरी गाती हैं तो पूरा वातावरण लोकगीतों की मिठास से सराबोर हो उठता है।
भोजपुरी फिल्म अभिनेता एवं गायक गोपाल राय ने बताया कि कजरी पूर्वांचल की लोक संस्कृति की अनमोल पहचान है। सावन में महिलाएं समूह बनाकर कजरी गाती हैं। गीतों में राधा-कृष्ण के प्रेम, साजन की प्रतीक्षा, मायके की याद, सावन की हरियाली और झूले की उमंग का सुंदर चित्रण मिलता है। कजरी के बोलों में ग्रामीण जीवन की सहजता और रिश्तों की आत्मीयता साफ झलकती है। उन्होंने कहा कि पहले सावन शुरू होते ही गांव की महिलाएं पेड़ों पर झूले डालकर घंटों कजरी गाया करती थीं। कजरी महज मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि लोक संस्कृति और पारिवारिक रिश्तों को जोड़ने वाली जीवंत परंपरा है। आधुनिकता के दौर में भी सावन आते ही गांवों में कजरी की तान सुनाई देना इस बात का प्रमाण है कि लोकगीत आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं। आने वाली पीढ़ी को इस समृद्ध परंपरा से जोड़ना जरूरी है, ताकि पूर्वांचल की यह सांस्कृतिक मिठास यूं ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी कायम रहे।

रिपोर्ट – त्रिलोकी नाथ राय

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