जमीयत उलमा ने जौहर यूनिवर्सिटी को निशाना बनाने पर चिंता जताई
38 इमारतों को गिराने का आदेश देना , प्राकृतिक न्याय के खिलाफ
लखनऊ/कानपुर। जमीयत उलमा उत्तर प्रदेश ने रामपुर की मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी को निशाना बनाने पर चिंता व्यक्त की। नक्शा पास न होने की बात कहकर 38 इमारतों को गिराने का आदेश रामपुर के डीएम ने दिया है। इसे कानून के शासन, प्राकृतिक न्याय और सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारियों के खिलाफ बताया है।
इस संवेदनशील मामले पर जमीयत उलमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष हज़रत मौलाना महमूद असद मदनी की तरफ से उठाए गए समय पर और सैद्धांतिक रुख का पूरा समर्थन किया गया।
जमीयत उलमा उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष मुफ्ती अफ्फान मंसूरपुरी ने मौलाना महमूद असद मदनी के रुख का भरपूर समर्थन किया। उन्होंने अपने बयान में स्पष्ट किया कि शिक्षण संस्थान राष्ट्र निर्माण का जरिया होते हैं, इसलिए इमारत गिराने की इस विवादित कार्रवाई से न केवल हजारों छात्रों का शैक्षिक भविष्य और उनके बुनियादी अधिकार प्रभावित होंगे, बल्कि देश और राज्य की महान शैक्षिक संपत्ति को भी ऐसा नुकसान पहुंचेगा जिसकी भरपाई नहीं की जा सकेगी।
मौलाना अमीन-उल-हक अब्दुल्ला कासमी ने अध्यक्ष मोहतरम मौलाना मदनी के बयानों की रोशनी में स्पष्ट किया कि अगर किसी निर्माण में कोई तकनीकी खामी या कानून का उल्लंघन साबित भी हो जाए, तब भी इमारत को गिराना हमेशा एकमात्र या जरूरी रास्ता नहीं होता। उत्तर प्रदेश शहरी योजना एवं विकास अधिनियम 1973 की धारा 27(1) खुद इस बात की साफ तौर पर पुष्टि करती है कि इमारत को गिराना हर हाल में अनिवार्य नहीं है। अगर कोई इमारत बुनियादी भूमि उपयोग (लैंड यूज) या मास्टर प्लान के खिलाफ न हो, तो संबंधित अथॉरिटी संशोधित नक्शे की मंजूरी, रेगुलराइजेशन, डेवलपमेंट फीस, कंपाउंडिंग और अन्य आर्थिक जुर्मानों के जरिए मामले को कानून के दायरे में सुलझा सकती है। राज्य की अलग-अलग विकास संस्थाएं सालों से ऐसे ही कानूनी विकल्पों को अपनाती आई हैं। इसलिए एक स्थापित महान शिक्षण संस्थान के मामले में, इमारत गिराने जैसे सख्त कदम से पहले इन सभी कानूनी संभावनाओं पर गंभीरता से विचार करना न्याय, कानून और जनहित की पहली मांग है।
मौलाना ने उदाहरण देते हुए बताया कि इस संबंध में अदालतों के कई पिछले फैसले (नजीरें) मौजूद हैं, जिनमें कानपुर के रूमा इंडस्ट्रियल एरिया में स्थित इंजीनियरिंग कॉलेज, वाराणसी डेवलपमेंट अथॉरिटी, झांसी डेवलपमेंट अथॉरिटी और इलाहाबाद डेवलपमेंट अथॉरिटी से संबंधित मुकदमे प्रमुख हैं। इन सभी मुकदमों में अदालतों ने तुरंत इमारत गिराने के बजाय कंपाउंडिंग, रेगुलराइजेशन और अन्य कानूनी विकल्पों को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया है।
इसलिए, जमीयत उलमा उत्तर प्रदेश राज्य सरकार से पुरजोर मांग करती है कि वह इस संवेदनशील मामले में संवैधानिक और कानूनी सावधानी तथा दूरदर्शिता दिखाए। अध्यक्ष जमीयत उलमा-ए-हिंद हज़रत मौलाना महमूद असद मदनी साहब की अपील के बिल्कुल अनुरूप, इस ध्वस्तीकरण की कार्रवाई पर तुरंत पुनर्विचार किया जाए और अन्य वैकल्पिक कानूनी उपाय अपनाए जाएं, ताकि एक तरफ कानून का पालन हो सके और दूसरी तरफ हजारों छात्रों का शैक्षिक भविष्य तथा भारत की यह कीमती शैक्षिक संपत्ति तबाह होने से महफूज़ रह सके।




