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राजनीति

सत्ता की क्रूरता और राजनीति का यथार्थ – शश्वत तिवारी

@राजनीति आज-कल

सत्ता कितनी क्रूर और बेरहम होती है, उसका पता तृणमूल नेताओं के रवैये से चलता है। खराब समय की पहली बरसात भी नहीं झेल पाई तृणमूल कांग्रेस। एक वक्त पर संघर्ष की पार्टी थी, लेकिन अब पार्टी अपने वजूद के लिए ही संघर्ष कर रही है। जिन्होंने लगातार 15 साल सत्ता सुख भोगा, पर सत्ता छिटकते ही पलट गए। क्या ऐसे नेता जनता के प्रति जवाबदेह हो सकते हैं? असली नेता की पहचान तो संकट में डटे रहने और उसमें खुद को साबित करने से ही होती है। भारतीय राजनीति का इतिहास इस बात का साक्षी है कि सत्ता जितनी आकर्षक होती है, उतनी ही निर्मम भी। सत्ता अपने साथ वैभव, प्रभाव और अधिकार लेकर आती है, लेकिन जैसे ही उसका आधार डगमगाता है, वही सत्ता लोगों के वास्तविक चरित्र को भी उजागर कर देती है। राजनीतिक दलों का उत्थान और पतन केवल चुनावी परिणामों की कहानी नहीं होता, बल्कि वह नेताओं की निष्ठा, विचारधारा और संघर्षशीलता की भी परीक्षा होती है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का सफर इसी संदर्भ में एक महत्वपूर्ण अध्ययन प्रस्तुत करता है। कभी वामपंथी शासन के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक रही यह पार्टी आज अपने भीतर उठ रहे असंतोष, बगावत और अवसरवाद की चुनौतियों से जूझती दिखाई दे रही है। हाल के वर्षों में पार्टी से कई बड़े नेताओं का अलग होना और राजनीतिक परिस्थितियों के बदलते ही निष्ठाओं का बदल जाना भारतीय राजनीति के उस कटु सत्य को सामने लाता है कि सत्ता के साथ आने वाले लोग हमेशा संघर्ष के साथ नहीं रहते।  तृणमूल कांग्रेस का गठन 1998 में हुआ था। इसकी संस्थापक ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर इसे खड़ा किया। उस समय पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे का प्रभुत्व था और उसके खिलाफ राजनीतिक संघर्ष आसान नहीं था। टीएमसी ने सड़क से लेकर संसद तक संघर्ष किया। सिंगूर और नंदीग्राम जैसे आंदोलनों ने पार्टी को जनसमर्थन दिलाया। इन आंदोलनों के बल पर 2011 में 34 वर्षों से सत्ता में रही वाम सरकार को हटाकर टीएमसी सत्ता में आई। उस दौर में पार्टी के नेता और कार्यकर्ता स्वयं को एक आंदोलनकारी शक्ति के रूप में प्रस्तुत करते थे। लेकिन इतिहास बताता है कि आंदोलनकारी दल जब लंबे समय तक सत्ता में रहते हैं, तो धीरे-धीरे उनमें वही प्रवृत्तियाँ विकसित होने लगती हैं जिनके खिलाफ वे कभी संघर्ष करते थे।

राजनीति में विचारधारा की चर्चा बहुत होती है, लेकिन व्यवहारिक राजनीति में अक्सर सत्ता ही सबसे बड़ा आकर्षण बन जाती है। जब कोई दल लगातार सत्ता में रहता है, तो उसके आसपास ऐसे लोगों की संख्या बढ़ने लगती है जिनका संबंध विचार से कम और लाभ से अधिक होता है। यही कारण है कि जब राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलती हैं तो सबसे पहले ऐसे लोग ही पाला बदलते हैं। टीएमसी के संदर्भ में यह स्थिति नई नहीं है। 2017 में पार्टी के प्रमुख रणनीतिकार रहे मुकुल रॉय ने पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया। बाद में राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलने पर वे फिर टीएमसी में लौट आए।  इसी प्रकार शुभेंदु अधिकारी जिन्हें नंदीग्राम आंदोलन का महत्वपूर्ण चेहरा माना जाता था, 2020 में टीएमसी छोड़कर भाजपा में चले गए। इन घटनाओं ने यह प्रश्न खड़ा किया कि क्या भारतीय राजनीति में विचारधारा वास्तव में स्थायी तत्व रह गई है, या फिर वह केवल सत्ता तक पहुँचने का माध्यम भर बनकर रह गई है? राजनीति में किसी नेता की वास्तविक पहचान तब नहीं होती जब उसके पास सत्ता हो, बल्कि तब होती है जब उसके सामने संकट खड़ा हो। इतिहास गवाह है कि अनेक नेता चुनाव हारने, सत्ता खोने और राजनीतिक प्रतिकूलताओं के बावजूद अपने विचारों पर अडिग रहे। ऐसे नेताओं की संख्या भले कम रही हो, लेकिन जनता ने उन्हें लंबे समय तक सम्मान दिया। इसके विपरीत, जो नेता केवल सत्ता के साथ खड़े रहते हैं और कठिन समय आते ही नई राजनीतिक शरण तलाश लेते हैं, उनकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। आज यदि किसी राजनीतिक दल में बगावत होती है, तो यह केवल संगठनात्मक संकट नहीं होता, यह उस राजनीतिक संस्कृति का भी संकेत होता है जो वर्षों में विकसित हुई है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है, क्या अवसरवाद केवल टीएमसी की समस्या है?

उत्तर स्पष्ट रूप से ‘नहीं’ है।भारतीय राजनीति में लगभग हर दल ने दलबदल की राजनीति देखी है। कांग्रेस, भाजपा, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, जनता दल परिवार और क्षेत्रीय दल, सभी इस प्रवृत्ति से प्रभावित रहे हैं। वास्तव में समस्या किसी एक दल की नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति की है जिसमें विचारधारा से अधिक महत्व चुनावी संभावना को मिलने लगता है।आज राजनीति में “विजेता के साथ खड़े होने” की मानसिकता बढ़ी है। अनेक नेता उस दल में जाना पसंद करते हैं जहाँ उन्हें सत्ता, पद या भविष्य की अधिक संभावना दिखाई देती है। इसलिए टीएमसी की स्थिति को केवल एक दल की विफलता के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की व्यापक चुनौती के रूप में देखना चाहिए।सत्ता का एक स्वभाव यह भी है कि वह मित्र और विरोधी की परिभाषा बदल देती है। जब कोई दल मजबूत होता है तो उसके आसपास बड़ी संख्या में समर्थक दिखाई देते हैं। लेकिन जैसे ही उसकी स्थिति कमजोर होती है, वही समर्थक दूरी बनाने लगते हैं। राजनीति में इसे अक्सर “सत्ता का मौसम विज्ञान” कहा जाता है, जहाँ लोग सिद्धांतों से नहीं, बल्कि हवा के रुख से अपने निर्णय लेते हैं। हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों में टीएमसी के भीतर असंतोष और कुछ नेताओं के अलग होने की खबरें इसी प्रवृत्ति को रेखांकित करती हैं। हालाँकि यह भी उतना ही सच है कि किसी भी दल में असहमति होना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब असहमति वैचारिक न होकर केवल सत्ता-समीकरणों से प्रेरित दिखाई देने लगे। लोकतंत्र में अंतिम शक्ति जनता के पास होती है। जब कोई नेता जनता के वोट से चुनकर आता है और फिर व्यक्तिगत राजनीतिक लाभ के लिए बार-बार दल बदलता है, तो सबसे बड़ा प्रश्न जनता के विश्वास का होता है। मतदाता किसी व्यक्ति को केवल उसके चेहरे के आधार पर नहीं चुनता; वह उसके दल, विचारधारा और चुनावी वादों को भी ध्यान में रखता है।

ऐसी स्थिति में बार-बार होने वाला दलबदल लोकतांत्रिक नैतिकता को कमजोर करता है। यही कारण है कि दलबदल विरोधी कानून बनाया गया था। लेकिन राजनीतिक दलों और नेताओं ने समय-समय पर उसके प्रावधानों का भी अपने हित में उपयोग करने के रास्ते खोज लिए। टीएमसी की वर्तमान चुनौतियाँ अन्य राजनीतिक दलों के लिए भी एक महत्वपूर्ण सबक हैं। पहला सबक यह है कि संगठन केवल सत्ता के आधार पर मजबूत नहीं बनता।दूसरा विचारधारा और कार्यकर्ता-आधारित राजनीति का कोई विकल्प नहीं है। तीसरा, यदि किसी दल में आंतरिक लोकतंत्र कमजोर होता है तो असंतोष धीरे-धीरे बगावत का रूप ले सकता है।चौथा, केवल चुनाव जीतना ही पर्याप्त नहीं है, कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच विश्वास बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहाँ राजनीतिक दल आते-जाते रहेंगे, चुनावी परिणाम बदलते रहेंगे और सत्ता का हस्तांतरण होता रहेगा। लेकिन लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती इस बात में है कि राजनीतिक दल विचारों और सिद्धांतों के आधार पर खड़े रहें। यदि राजनीति केवल सत्ता प्राप्ति और सत्ता संरक्षण का माध्यम बनकर रह जाएगी, तो जनता का विश्वास कमजोर होगा। जनता नेताओं से केवल भाषण नहीं, बल्कि कठिन समय में साहस और प्रतिबद्धता भी चाहती है। तृणमूल कांग्रेस की वर्तमान परिस्थितियाँ एक बड़े राजनीतिक सत्य की ओर संकेत करती हैं। सत्ता का आकर्षण जितना बड़ा होता है, सत्ता से दूर होने का भय भी उतना ही बड़ा होता है। ऐसे समय में नेताओं की वास्तविक परीक्षा होती है।किसी भी दल के लिए सबसे बड़ा संकट चुनाव हारना नहीं होता, बल्कि अपने लोगों की निष्ठा खो देना होता है। इतिहास में वही नेता और वही दल लंबे समय तक सम्मान पाते हैं जो संकट के समय भी अपने सिद्धांतों और कार्यकर्ताओं के साथ खड़े रहते हैं। राजनीति में सत्ता आती-जाती रहती है, लेकिन चरित्र और विश्वसनीयता ही वह पूँजी है जो किसी नेता को इतिहास में स्थान दिलाती है। जो लोग सत्ता के साथ आते हैं, वे सत्ता के साथ चले भी जाते हैं; पर जो लोग विचार और संघर्ष के साथ खड़े रहते हैं, वही लोकतंत्र की वास्तविक ताकत बनते हैं। शायद यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश है, सत्ता स्थायी नहीं होती, लेकिन संघर्ष, निष्ठा और जनविश्वास की कसौटी पर खरा उतरने वाला नेतृत्व ही स्थायी विरासत छोड़ता है।

– लेखक: विश्लेषक एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं

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