
प्रमोद सिन्हा
गाज़ीपुर। राज्यस्तरीय कार्यालयों के नाम बदलने का सुझाव के पश्चात राज्यसभा सांसद डॉ. संगीता बलवंत ने वंदे मातरम’ के 150 साल पूरे होने के मौक़े पर सदन में जोरदार तरीक़े से अपनी बात रखी।राज्यसभा सांसद ने स्वरचित पंक्तियों को कहते हुए कहा कि “मातृभूमि को शीशझुकाकर निस दिन वंदन हो जननी का।वंदे मातरम के गुंजन से नित अभिनंदन हो जननी का।” वंदे मातरम् ! ये दो शब्द कभी ब्रिटिश साम्राज्य के कोड़ों को रोक देते थे। ये दो शब्द सामान्य मनुष्यों को शहीद बना देते थे और भय को स्वतंत्रता में बदल देते थे।
जब बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 7 नवम्बर 1875 में कार्तिक शुक्ल नवमी के दिनइसे लिखा था, उन्होंने सिर्फ एक गीत नहीं लिखा उन्होंने स्वतंत्र भारत की भविष्यवाणी लिखी थी।उन्होंने भारत माता को केवल धरती नहीं, बल्कि धन में लक्ष्मी, ज्ञान में सरस्वती, और शक्ति में दुर्गा के रूप में देखा। वंदे मातरम् भारत की आत्मा है। आराधना है। यह शब्द हमें इतिहास में ले जाता है। हमारे वर्तमान को आत्मविश्वास से भर देता है और हमारे भविष्य को ये नया हौसला देता है कि ऐसा कोई संकल्प नहीं जिसकी सिद्धि न हो सके।बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय जी का आनंदमठ मात्र एक उपन्यास नहीं बल्कि एक ऐसा मंत्र था जिसने सबको देशभक्ति की चार के भाव में डूबो दिया। बन्देमातरम् से ऐसी ज्वाला निकली जिसने लाखो भारतीयों को अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा दी। आजादी के आन्दोलन में जब भी इस गीत का नारा लगाया जाता था, स्वतन्त्रता सेनानियों के मन में एक नई ऊर्जा और साहस भर जाता था1896आजाद से लेकर तिरुपुर कुमारन तक, एक ही नारा था वन्दे मातरम् । महात्मा गांधी ने स्वीकार किया था कि वंदे मातरम् में ‘सबसे सुस्त रक्त को भी जगाने की जादुई शक्ति थी। इसने उदारवादियों और क्रांतिकारियों तथा विद्वानों और नाविकों तक को एकजुट किया।महर्षि अरविंद जी ने इसीलिए कहा था कि यह भारत के पुनर्जन्म का मंत्र है। वंदे मातरम हमारी मातृभूमि की सुंदरता, शक्ति और महानता का गुणगान करता है यह हमें भारत के हरे-भरे खेतो, नदियों और समृद्ध संस्कृति की याद दिलाता है। यह गीत हमें अपने देश का सम्मान करने और पूरी निष्ठा से उसकी सेवा करने का संदेश देता है।




