गाजीपुर : जब भी रोते थे उनकी आंखों से खून गिरने लगता….
शहादत दिवस पर निकला ईमाम - ए सज्जाद का ताबूत

गाजीपुर । नगर स्थित इमामबाड़ा मीर जामिन हुसैन साहब खुदाईपुरा नखास से परंपरागत इस साल भी इमाम ए हुसैन के बेटे और कर्बला की घटना के चश्मदीद इमाम ए सज्जाद की शहादत पर 25 मोहर्रम को जुलूस ए ताबूत व अलम निकाला गया। जिसमे सबसे पहले गुलंबर पर दोपहर 1 बजे मजलिस का आयोजन हुआ। जिसमें सबसे पहले मौलाना जाबिर अली कुम्मी ने कुरान का पाठ करके कार्यक्रम की शुरुआत की। सोज़ख़्वानी में सैयद अली अब्बास नक़वी आज़मी ने इमाम ए सज्जाद की शहादत की घटना को दर्द भरे अंदाज़ में पेश किया। कार्यक्रम का संचालन मौलाना राहत हुसैन ने किया। पेशख़्वानी के लिए शायर को आवाज़ दी जिसमें मुदस्सिर जौनपुरी ने इमाम ए सज्जाद की ज़िंदगी पर प्रकाश डालते हुए अपने कलाम से लोगों की आंखों में आंसू का सैलाब पैदा कर दिया। मजलिस को बुकनाला सादात, ज़िला बिजनौर से आए इस्लामिक स्कॉलर मौलाना सैय्यद इब्ने अब्बास साहब ने पढ़ा और बताया कि ये वो इमाम है जिसने कर्बला में अपने पूरे घर को कत्ल होते हुए देखा और सब्र किया क्योंकि सब्र ही दुनिया में सबसे बड़ी शक्ति है लेकिन जब समय आया तो यही हुसैन का बेटा दरबार ए यजीद में पूरे दरबार को ललकार उठा और अपने ख़ुतबे (संबोधन) से यजीद के काले कारनामों कलई खोल के रख दी। जबकि यजीदी दरबार में इनके संबोधन को अज़ान से रोकने की कोशिश की गई। जब अज़ान समाप्त हुई तो इमाम ए सज्जाद ने यज़ीद से पूछा कि बता कि अभी जो अज़ान हुई उसमें किसके बाप दादा का नाम अज़ान देने वाले ने लिया? अगर हम मिटने वाले होते तो कर्बला में ही मिट गए होते। यजीदी फौज ने कर्बला में इस इमाम के बिस्तर को भी जला दिया। कर्बला से कूफ़ा और कूफे से शाम इस इमाम को भारी भारी ज़ंजीरों में क़ैद कर के ले जाया गया। जिसकी वजह से इस इमाम के गोश्त हथकड़ी और बेड़ियों से गल गए थे। मौलाना बताते हैं कि आज दुनिया में जितने भी सैय्यद है सब इसी इमाम की नस्ल से हैं। मौलाना आगे बताते हैं कि कर्बला की घटना के बाद इमाम ए सज्जाद कभी हंसे नहीं और अपनी इमामत के काम को बखूबी अंजाम देते रहे और लोगों की हर तरह से मदद करते रहे। मौलाना ने बताया कि यही वो इमाम हैं जिनकी नस्ल से आज भी दुनिया में बहादुर लोग पैदा हो रहे हैं। जिनमें ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई भी थे। जिन्होंने अपनी जान देना गवारा समझा लेकिन ज़ुल्म के आगे झुके नहीं जिसका नतीजा ये हुआ कि अभी हाल में ही उनके पार्थिव शरीर के साथ साथ उनके परिवार के अन्य सदस्यों को सुपुर्द ए ख़ाक किया गया।
मजलिस के फौरन बाद इमामबाड़ा मीर जामिन हुसैन से इमाम ए सज्जाद का ताबूत निकला। जिसके साथ अशफ़ाक हुसैन “हसीन” ने इमाम के ऊपर पड़ने वाली मुसीबतों को बयान किया जिससे लोगों की आँखें भर आईं। ताबूत का परिचय कराते हुए शिया धर्मगुरु मौलाना सैय्यद कल्बे हसन नक़वी ने बताया कि कर्बला की घटना के बाद लगभग 40 साल तक इमाम रोएं हैं। जब भी रोते थे उनकी आंखों से खून गिरने लगता था। मौलाना आगे बताते हैं कि जब इमाम ए सज्जाद घर से बाहर निकलते थे तो कसाई अपनी दुकान बंद कर लेते थे क्योंकि इमाम ए सज्जाद के बाप इमाम हुसैन को कुंद खंजर भूखे और प्यासे शहीद कर दिया गया। इमाम ए सज्जाद जानवर ज़िबाह करने वालो को हमेशा कहते थे कि जानवर को जब भी जिबाह करो तो पानी दाना खिलाने के बाद क्योंकि मेरे बाबा हुसैन को कर्बला में मुसलमानों ने भूखा और प्यासा ही कत्ल कर दिया जबकि मेरे बाबा के नाना मोहम्मद साहब ने बताया कि जानवर जब भी जिबाह करो तो खाना पानी दे के ही जिबाह करो। इसी बात को याद करके इमाम ए सज्जाद की आँखें खून से भर जाती थी।अंत में जौनपुर के विश्व प्रसिद्ध नाैहाखान मुदस्सिर जौनपुरी ने अपनी दर्द भरी आवाज़ में इमाम की मुसीबत से संबंधित नाैहा पेश किया जिसके हमराह अंजुमन हुसैनिया के सदस्यों ने मातम किया। अंत में मौलाना जाबिर अली जंगीपुरी ने इमाम ए सज्जाद से मंसूब (संबंधित) दुआ पढ़ाई जिसके बाद कार्यक्रम समाप्त हुआ। अंत में ग्रामीण और नगरीय क्षेत्र से आए हुए महिला पुरुष एवं बच्चों के साथ सभी आगंतुकों का जुलूस के आयोजक डॉo ज़फ़र हुसैन आब्दी एवं कार्यक्रम के संयोजक वाहिद आब्दी ने धन्यवाद दिया।



