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लेख

महान मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण सर्वसमावेशी,समतामूलक समाज बनाने का संकल्प है संविधान

हिंदुस्तान संदेश
किसी भी देश का संविधान उस के शासकों , प्रशासकों, न्यायविदों , राजनेताओं, जनप्रतिनिधियों, वकीलों , बुद्धि जीवियों और जिम्मेदार नागरिकों के लिए सर्वोत्तम पथ प्रदर्शक दस्तावेज होता है। संविधान के आलोक में ही किसी भी राष्ट्र का राष्ट्रीय जीवन और राष्ट्र में रहने वाले नागरिकों का जन जीवन सजता , संवरता, मर्यादित , विकसित और अनुशासित होता है। आधुनिक काल में वैसे तो अलिखित संविधान के रूप में सबसे पुराना संविधान ग्रेट ब्रिटेन का संविधान हैं , जो अभिसमयों और संवैधानिक परम्पराओँ पर आधारित है, परन्तु लिखित संविधान की परम्परा का आरम्भ संयुक्त राज्य अमरीका से माना जाता हैं। संयुक्त राज्य अमरीका की तर्ज़ पर आस्ट्रेलिया, स्विट्जरलैंड , फ्रांस, कनाडा,जर्मनी सहित अन्य यूरोपीय देशों का संविधान लिखा गया। इसी परम्परा में सत्ता हस्तांतरण के संक्रमण कालीन दौर में भारतीय संविधान का लेखन कार्य आरंभ हुआ। हमारे दूरदर्शी महान स्वाधीनता संग्राम सेनानियों के सुनहरे सपनों को साकार करने के लिए संकल्प पत्र के रूप में भारत का संविधान आज ही के दिन 26 नवम्बर 1949 को पूर्ण रूप से बनकर तैयार हुआ था और आज ही हमारे संविधान सभा के समस्त महान मनीषियों ने इस पर हस्ताक्षर कर इसे भारत की जनता की तरफ से अंगीकृत,अधिनियमित और आत्मार्पित किया था। लम्बे संघर्ष की यातनापूर्ण अनुभूतियों को हृदय में सहेजें समेटे हमारे संविधान निर्माताओं ने दो वर्ष ग्यारह महीने अट्ठारह दिन लगभग तीन वर्ष तक लम्बे विचार विमर्श , व्यापक बहस और मैराथन के उपरांत भारतीय संविधान को तैयार किया। 26 नवम्बर 1949 को निर्मित हमारे पवित्र संविधान को हमारे विद्वान संविधानविदों ने ठीक दो महीने बाद 26 जनवरी को लागू करने का निश्चय किया। क्योंकि 26 जनवरी 1930 को रावी नदी के तट पर ऐतिहासिक लाहौर अधिवेशन में की गई पूर्ण स्वराज्य की ऐतिहासिक घोषणा की महत्ता को भारतीयो में जीवंत रखा जा सके।

इसी ऐतिहासिक घोषणा के अनुसार 1930 से 1947 तक हर साल 26 जनवरी को भारतवासी स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाते आ रहे थे। इस ऐतिहासिक और महान परंपरा को जीवंत रखने के लिए भारतीय संविधान को 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया। डॉ राजेंद्र प्रसाद, पंडित जवाहरलाल नेहरु, बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर,सरदार बल्लभ भाई पटेल , मौलाना,अबुल कलाम आज़ाद और पंडित अलगू राय शास्त्री जैसे 389 संविधानविदो ने मिलकर जो संविधान बनाया उसमें लगभग दो सौ वर्षों तक ब्रिट्रिश सरकार के दौरान हमारे स्वाधीनता संग्राम सेनानियों द्वारा भोगी गई यातनापूर्ण संघर्ष की अनुभूतिओ की झलक साफ-साफ दिखाई देती है। विश्व कप के सबसे विशाल , अद्वितीय और अनूठे संविधान में भारतीय समाज में व्याप्त , विविधताओं, विषमताओं और अंतर्विरोधों में सामंजस्य स्थापित करने की अद्भुत क्षमता है। जिस तरह चौदह वर्षीय वनवासी जीवन की अनुभूतियों ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम को जनता की आशाओं, आकांक्षाओं और आवश्यकताओं के अनुरूप एक आदर्श राज्य जिसे भारतीय वांगमय में  रामराज्य कहा जाता है स्थापित करने के लिए प्रेरित किया। उसी तरह हमारे स्वाधीनता संग्राम सेनानियों ने अपनी यातनापूर्ण अनुभूतियों से प्रेरित होकर भारतीय संविधान को एक ऐसा दस्तावेज बनाया जिसके प्रकाश में भारत को एक आदर्श , नैतिक और मानवतावादी मूल्यों से लबरेज, लोकतांत्रिक और कल्याणकारी राज्य बनाया जा सकें।


    भारतीय संविधान में पुलिसिया राज्य के विरुद्ध एक कल्याणकारी राज्य बनाने का संकल्प दिग्दर्शित होता हैं परन्तु पचहत्तर वर्षों के शासन के बाद भी हम एक आदर्श कल्याणकारी राज्य स्थापित करने में असफल रहे हैं। हमारे देश के नीति निर्माताओं द्वारा नीति निदेशक तत्वों की अवहेलना, शासन सत्ता पर पूंजीवादी प्रभाव और भावनात्मक राजनीति के बढते चलन-कलन के कारण भारत एक आदर्श कल्याणकारी राज्य के रूप में परिवर्तित नहीं हो पाया। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 मे स्पष्ट रूप से कहा गया है कि-“प्रत्येक भारतीय नागरिक को जिन्दा रहने का अधिकार है (every Indian citizen has toalive )”। परन्तु यह सर्वविदित तथ्य है कि-जिविकोपार्जन के साधनों के अभाव में जिन्दा रहने का अधिकार महज कागजी हैं। प्रकारांतर से काम के अधिकार को मौलिक अधिकार बनायें बिना कोई भी राज्य अपने नागरिकों को जिन्दा रहने का अधिकार देने का वादा नहीं कर सकता हैं। पचहत्तर वर्षों के शासन के बाद भी हम काम के अधिकार को मौलिक अधिकार नहीं बना पाए। जबकि- नीति निदेशक तत्वों से संबंधित अनुच्छेद 41 मे नागरिकों को कुछ दशाओं में काम, शिक्षा और लोक सहायता पाने का अधिकार दिया गया है।
    मनोज कुमार सिंह
लेखक/साहित्यकार/उप-सम्पादक

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