गोदी मीडिया के बाद अब इंफ्लुएंसर को विपक्ष के पीछे छोड़ा
बालाघाट में सीजेपी फाउंडर अभिजीत दीपके को घेरने की निंदा, स्थानीय पत्रकारों ने भी इस हरकत के लिए सरकार और सत्ताधारी दल को जिम्मेदार बताया, सोशल मीडिया में भी कथित पत्रकारों का सवाल पूछना चर्चा का विषय बना
आसिफ हुसैन ः कानपुर। मध्य प्रदेश के बालाघाट के एक गांव में दूषित पानी पीने से लगभग 30 बच्चों की मौत हो चुकी है। अभी तक मध्य प्रदेश सरकार और

प्रशासन ने कोई उचित व्यवस्था नहीं की है। समस्या को देखते हुए कॉक्रोच जनता पार्टी के फाउंडर अभिजीत दीपके मौके पर पहुंचे। उनके दौरे को देखते हुए भाजपा ने कतिथ पत्रकारों की टीम भेज दी। उन लोगों ने दीपके के कार से उतरने का भी इंतजार नहीं किया और एक युवती कहने लगी आ गए लाशों पर राजनीति करने। यह देख दीपके भी भौचक्के रह गए और इतने सारे कथित पत्रकारों को देखकर स्थानीय पत्रकार भी चौक गए। कथित पत्रकारों ने स्थानीय पत्रकारों से भी अभद्रता की। इस पर अब सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है कि क्या सरकारों का काम गोदी चैनल नहीं कर पा रहे हैं जो इंफ्लुएंसरों को भेजा जाने लगा है।
सीजेपी के फाउंडर बालाघाट के आदिवासी बहुल गांव पहुंचे। वह यह जानने गए थे कि गांव के लोग किस तरह का पानी पी रहे हैं। आखिर इतने बच्चों की मौतें कैसे हो गईं? जब वह पहुंचे तो कथित पत्रकारों ने उनको घेर लिया। सवाल किया अब क्यों आए हो? लाशों पर राजनीति करने आ गए? इस पर दीपके ने शालीनता से जवाब दिया कि देरी से आने के लिए माफी मांगता हूं। उन्होंने कथित पत्रकारों से सवाल किया कि इतनी मौतों का जिम्मेदार कौन है? तो एक कथित पत्रकार बोला, ‘सभ्यता’। अब कथित पत्रकार ने आदिवासियों के रहन, सहन पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया। इन कथित पत्रकारों को एक स्थानीय पत्रकार ने भी जमकर धोया।
कथित पत्रकारों के झुंड से भी अभिजीत दीपके परेशान नहीं हुए। उनका एक राज्यपाल को कथित त्यागपत्र देने का फोटो दीपके भी वायरल हो रहा है। कथित पत्रकारों ने को ऐसे घेरा कि जैसे ही वह इन मौतों के जिम्मेदार हैं, प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव नहीं अभिजीत दीपके हैं। सवाल होने चाहिए सरकार और सरकार के मुखिया से वह सवाल विपक्ष से हो रहे हैं। कहीं तो मुखिया मीडिया का सवाल लेते ही नहीं हैं। सिर्फ एकतरफा मामला चल निकला है। बालाघाट की पत्रकार माधुरी कटारने ने प्रशासन, पीआरओ, सरकार और सत्ताधारी दल को जमकर धोया। उन्होंने कहा कि कथित पत्रकारों को बुलाकर मीडिया की आवाज दबाने का काम किया गया। पहले कलक्टर साहब की फिर दीपके की बेइज्जती की गई। उन्होंने कहा कि बालाघाट की इस तरह की परिपाटी नहीं रही है। आपत्ति इस बात की है कि हमारे ही मिडिया साथियों के साथ बत्तमीजी कर रहे हैं। कलम के सिपाहियों ने किसी के मुंह पर माइक डालकर लाशों पर राजनीति करने का सवाल नहीं किया। उनका यह पूरा भाषण भी सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है। यहां तक कि उमाशंकर सिंह ने भी अपने एक्स हैंडल से इसे शेयर किया है।
कुछ लोगों के हाथ में मोबाइल के साथ माइक पकड़ाकर और उनको कुछ पैसे देकर किसी के पीछे लगाना ठीक नहीं है। किसी को भी सवाल पूछना है तो वह शालीनता से पूछ सकता है। अपना एजेंडा और सरकार की नाकामियों को छुपाने के लिए इस तरह के हथकंडे अपनाना देश के लोकतंत्र और पत्रकारिता के लिए अच्छा नहीं है। पहले से ही गोदी मीडिया से देश उबर नहीं पा रहा है। जनता के मुद्दे मुख्य मीडिया से गायब हो गए हैं। गोदी मीडिया को छोड़कर आए पत्रकारों ने यूट्यूब चैनल शुरू किए। वह जनता के सवालों के साथ सरकारों की नाकामियों को दिखा और बता रहे हैं। जिस तरह से छात्रों के आंदोलन ने शिक्षा, बेरोजगारी को मुद्दा बनाया है उससे सरकारों का असहज होना स्वाभाविक है लेकिन उसके लिए खरीदे पत्रकारों को भेजना ठीक नहीं जो यह कहे कि आ गए, आ गए, अब लाशों पर राजनीति करने।
पत्रकारों का पेशा बहुत सज्जनता का है। किसी से सवाल उसे बेइज्जत करने के लिए नहीं पूछना चाहिए। अगर अभिजीत वहां गए तो पहले तो उनको स्थानीय हकीकत से रूबरू हो जाने देते। पीड़ितों से मिलने के बाद उनसे सवाल पूछे जाते कि यहां तो आपने देख लिया। अब पीड़ितों के लिए क्या करेंगे? क्या सरकार के खिलाफ आंदोलन करेंगे? इतनी मौतों के लिए आप किसे जिम्मेदार मानते हैं? लेकिन सरकार की मंशा थी कि जाते ही अभिजीत को घेर दिया जाए। ताकि वह वहां से भाग जाएं लेकिन यह उलटा पड़ गया। इसकी पूरे देश में चर्चा हो गई। सोशल मीडिया में भी इसे दबाकर शेयर किया गया।




